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'असल में रोटी की गोलाई देश की सीमाओं से परे है और मजूरी यहां की सबसे बड़ी देशभक्ति है |

 'असल में रोटी की गोलाई देश की सीमाओं से परे है और

मजूरी यहां की सबसे बड़ी देशभक्ति है | ' -एक देश बारह दुनिया (लेखक - श्री शिरीष खरे )

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साहित्य का उद्देश्य क्या है ?
जिसमें सबके हित की भावना हो (सहितस्य भाव : साहित्यम्) ,और जो आपको संवेदनशील बनाएं | वह कथा साहित्य भी हो सकता है और कथेतर भी | 2021 में प्रकाशित - 'एक देश बारह दुनिया' इन दोनों कारकों को साधते हुए एक सफल साहित्य की श्रेणी में अपने आप को दर्ज़ कराती है |
   यह पुस्तक देश में हाशिए पर रह रहे न सिर्फ़ बारह अलग - अलग दुनिया की चर्चा करती है बल्कि ऐसी संभावना की तरफ भी इशारा करती है कि इस देश में ऐसी और भी अनगिनित दुनिया हो सकती हैं | जब देश की तथाकथित मुख्यधारा का इलेक्ट्रॉनिक मीडिया शोरगुल और हल्ला-हपाड़ी में व्यस्त हो और उस पर पक्षकारिता के आरोप लग रहे हो ,तभी एक पत्रकार द्वारा हाशिए पर ढकेले जा रहे लोगों की खोज -ख़बर लेना और उसको प्रभावी तरीके से मुख्यधारा के पाठकों के सामने लाने का साहस करना , वास्तव में प्रसंशनीय है |
       वैसे इस पुस्तक की शैली को प्रकाशक में रिपोर्ताज घोषित किया है तथापि इसे रिपोर्ताज़ के साथ - साथ यात्रा - वृतांत कहने में मुझे कोई संकोच नहीं | हर रिपोर्ट को तैयार करने में उसके साथ की गई यात्रा का बहुत ही जीवंत वर्णन लेखक श्री शिरीष खरे जी ने किया है |
      स्वयं लेखक के शब्दों में , ' ... उन समुदायों के किस्से हैं जिन्हें कभी विकास , कभी आधुनिकता तो कभी परिवर्तन के नाम पर और अधिक हाशिये पर धकेल दिया गया है | ' (प्रस्तावना )
    इस देश की पहली दुनिया जिससे लेखक परिचय कराते हैं वो है - भूखों की दुनिया | इस देश का वह स्थान जहां भूख की वजह से नवजात दम तोड़ देते हैं | किसी का मर जाना दुःखद है ,लेकिन उससे भी दुःखद है जब यह मौत एक 'न्यू नार्मल' बन जाए | यह दुनिया है - मेलघाट ,महाराष्ट्र की | ( 'वह कल मर गया' )
        अगली दुनिया है जहाँ पिंजरेनुमा कोठरियों में जिन्दगियां चल रही हैं | यह दुनिया कमाठीपुरा , महाराष्ट्र में चल रही एशिया की सबसे सबसे बड़ी देह मंडी की है |
       ऐसा नहीं कि हर दुनिया में अंधेरा ही लेखक ने देखा हो , जहां - जहां प्रकाश दिखा है वहाँ की बात भी ज़्यों की त्यों रखी गयी है | देश में आंतरिक विस्थापन लोगों को अपने ही देश में परदेसी बनाकर छोड़ देता है | रोजी-रोटी से जूझता समुदाय किन परिस्थितियों में सरकारी कागज़ जुटाएगा जिससे कि ताकि वह सरकारी योजनाओं का लाभ ले सके !
        इस पुस्तक के रिपोर्ट्स के शीर्षक इतने सारगर्भित और बेजोड़ हैं कि आप इस संग्रह की एक भी रिपोर्ट नहीं छोड़ सकते हैं | 'कोई सितारा नहीं चमकता' पढ़कर हम  घुमंतू जातियों विशेषकर सैय्यद मदारी समुदाय की वर्तमान दशा के बारे में जान पाते है | आज जब हम आज़ादी का अमृत महोत्सव तब भी इसी गणतंत्र एक बड़ा हिस्सा आज भी उपेक्षित है | लेखक के शब्दों में - "भारत का 'पूर्वोत्तर' उपेक्षा के रूप में चिन्हित है | देश के उपेक्षित क्षेत्र में भी कई अदृश्य पूर्वोत्तर हैं |"
     गन्ना किसानों की दुर्दशा की सुर्खियाँ  राष्ट्रीय अख़बार की हिस्सा आए दिन बनती रहती हैं ,कई बार यह विधानसभा चुनावों का प्रमुख मुद्दा भी लेकिन जिनकी बात छूट जाती है उनकी चर्चा - 'गन्ने के खेतों में चीनी कड़वी ' में लेखक ने की है | चीनी मालिकों और गन्ना मज़दूरों के बीच के बिचौलियों के आतंक से त्रस्त प्रवासी मज़दूर साल के 8 से 10 महीने अपना जीवन कैसे काटते हैं ,उसकी कल्पना आज का शहरी मध्यमवर्ग शायद कर भी न पाए ! गन्ने को जड़ से उखाड़ने वाले को , गन्ना उन्हें उनकी जड़ों  से उखाड़ फेंक चुका है |
      विकास और सौंदर्यीकरण की नई परिभाषा से बाहर हो रही झुग्गी बस्तियों को जिस अमानवीय तरीके से उजाड़ा जा रहा और उनको शहर से दूर पटका जा रहा है इससे हम सब परिचित हैं | एक नई समस्या बहु - विस्थापन की शुरू हो चुकी है | हर शहरों के विकास प्राधिकरण , नगर निगम और कारपोरेशन किस हद तक उदासीन और अमानवीय होते जा रहे हैं यह विस्थापित गरीबों से अच्छा कौन जानता है !
     'वे तुम्हारी नदी को मैदान बना जाएंगे ! ' एक लंबी रिपोर्ट है | बाँध, अवैध उत्खनन , नदी के किनारे प्रस्तावित परमाणु ऊर्जा संयंत्र , कोयला आधारित ताप संयंत्र , उद्योग आदि कैसे नदियों को बर्बाद कर रहे हैं और कैसे लोग अपनी जड़ों से विस्थापित होने को अभिशप्त हैं ,इसका लेखा जोखा इस रिपोर्ट में है | स्वनिर्धारण के जन अधिकार , सार्वजनिक भागीदारिता जैसे सार्वभौमिक अधिकारों को किस तरह सरकार दर सरकारें कुचल रही हैं - यह समझने के लिए यह रिपोर्ट काफ़ी है |
    'धान के कटोरे में राहत का धोखा ' खेती और किसान पर आए संकट की त्रासदी है | इस संकट को समझने में सबसे बड़ी गलती हो रही है - बीमारी की गलत पहचान और उसके बाद गलत उपचार |
   
          कुछ बातें और
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  लेखक ने जहाँ - तहाँ की सक्सेज स्टोरी भी लिखी है | जब - जब इस हाशिये पर रह रहे लोगों को सरकारी या ग़ैर सरकारी हौसला मिला ,सहयोग मिला ; तब - तब सफलता की इबारत इन लोगों के द्वारा लिखी गयी | अलग बात है कि ऐसे उदाहरण अल्पांश में ही हैं | लेखक के द्वारा की गई यात्राएं सौंदर्य के बजाय यथार्थ के संधान पर फोकस करती हैं |  लेखक के द्वारा जगह - जगह पर की गई टिप्पणियां इस रिपोर्ताज़ की मुख्य आकर्षण हैं जो किताब को पठनीय बनाती हैं | यथा -


'विशालकाय बाज़ार को छोटा बाज़ार और विशालकाय सभ्यता को छोटी सभ्यता को रौंद डालने का कोई अधिकार नहीं है |'
'स्कूल बच्चों को लोकतांत्रिक नागरिक बनाता है |'
' नीतियां बनाने वालों का नज़रिया शहरी है | '
' बैचैनी से विचार पैदा होते हैं और विचारों से विचारधारा बनती जाती है | '

       और अंत में
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गंभीर पाठकों के साथ - साथ सरकारी तंत्र से सम्बद्ध  अफ़सरों को यह रिपोर्ताज़ अवश्य पढ़नी चाहिए | इससे  न सिर्फ़ प्रशासन संवेदनशील बनेगा , बल्कि  देश में ऐसी ही अनगिनित दुनिया की संख्याओं में कमी आएगी |

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भवतोष पाण्डेय © 

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