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Showing posts from June, 2019
                      'कहानी' की कहानी                           ' कहानी क्या है ' कि जगह अगर 'कहानी क्या नहीं है'  पर  विचार किया जाए तो शायद कहानी के विस्तार को समझना ज़्यादा आसान होगा ! 'षष्ठी शेषे' अर्थात् 'जो बचा वह छठी विभक्ति' वाला सूत्र क्या कहानी पर लग सकता है ? किसी घटना की तथ्यपरक प्रस्तुति कहानी नहीं है | इतिहास लेखन भी कहानी नहीं | धर्मशास्त्र और उसमें उपस्थित नैतिक उपदेश भी कहानी की श्रेणी में नहीं है | समाचार पत्र के लेखों को आजकल 'स्टोरी' कहा जाने लगा लेकिन साहित्यिक अर्थ में वो भी कहानी नहीं है | जो कहानी नहीं है उसमें भी कहानी की संभावना बनी रहती है बस एक समर्थ कहानीकार की ज़रूरत है जो इस संभावना को यथार्थ में बदल सके |            मन में चल रही उधेड़बुन को शब्दों में गूंथना ही रचना कर्म है | मन में जो चल रहा है उसको ज्यों का त्यों शब्दों के ताने बाने में बुन पाना संभव नह...

भवतोष पाण्डेय : एक संक्षिप्त परिचय

1. पेशे से इंजीनियर लेकिन कवि मन ! 2. सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर स्वतन्त्र   टिप्पणीकार 3. आइआइटी बीएचयू से केमिकल इंजिनीरिंग में स्नातक तथा समाज शास्त्र , लोक प्रशासन और पत्रकारिता में ' शंकर बारात ' की तरह डिग्री और डिप्लोमा जुटाने के बाद समझ में आया कि अनुभव और दृष्टि से बड़ी कोई भी डिग्री नहीं | अनुभव से अर्जित इसी दृष्टि का परिणाम है - जुलूस की भीड़ ! 5. कई पत्रिकाओं और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर   कहानियाँ और कविताएं प्रकाशित 6. वर्तमान - एक महारत्न कंपनी में वरिष्ठ प्रबंधक पर तैनात 7. सम्पर्क - bhav.itbhu@gmail.com
जुलूस की भीड़ : समय सापेक्षता, समयबाध्य मूल्य और बदले हुए यथार्थ का संकलन                             -प्रो.कृपाशंकर चौबे        भवतोष पाण्डेय पेशे से इंजीनियर हैं किंतु लेखक के रूप में भी उनकी अलग पहचान है। उनकी प्रतिनिधि कहानियों का संग्रह ‘ जुलूस की भीड़ ’ इसलिए महत्वपूर्ण है कि इसके पात्र हमारे बीच के आम जन हैं, खास जन नहीं। हम नित्य जिस परिवेश में जी रहे हैं, उस परिचित परिवेश को ही भवतोष अपनी कहानी में उठाते हैं। किंतु वह परिवेश जटिल से जटितर होता जा रहा है। इस संग्रह के आधार पर एक छोटे से आईने में हम यह देख सकते हैं कि हिंदी कहानी आज कहां खड़ी है। ‘ जूलूस की भीड़ ’ संग्रह की ‘ वो राम अब नाहीं ’ , ‘ अविश्वास ’ , ‘ आजमाइश ’ , ‘ भूख और भय ’ , ‘ एक माल के सहयात्री ’ , ‘ निर्णय ’ , ‘ निर्दल ’ , ‘ जुलूस की भीड़ ’ , ‘ स्कैफोल्ड ’ , ‘ द्वंद्व ’ , ‘ अथश्री सुखई कथा ’ , ‘ अनैतिक नैतिकता ’ कहानियां यह बताती हैं कि हि...
जुलूस की भीड़ : एक संक्षिप्त परिचय सबसे पहला सवाल यही आता है कि इस संकलन में किस तरह की कहानियाँ हैं ? शीर्षक जुलूस की भीड़ से क्या आशय है ? इसका उत्तर एक दम सपाट नहीं | अगर पाठक संवेदनशील है तो कुछ कहानियाँ उनके पलकों गीली कर सकती हैं | कुछ कहानियों का प्लॉट ऐसा है जिनका सामना आप और हम रोज़ ही करते हैं | प्रेम की अपूर्णता इस संकलन का एक ख़ास फ़ीचर है | अपूर्णता कई जगहों पर अलगाव पर समाप्त हुआ है तो कई जगह उससे बहुत आगे तक पहुँचा है |    ऐसे माहौल में जहां घटनाओं की समीक्षा में राजनीति का कोण सबसे पहले आता हो , उस राजनीतिक परिस्थितियों को झुठलाया नहीं जा सकता है |कई कहानियों में मुख्य क़िरदार राजनीतिक षड्यंत्रों का शिकार होता दिखा है | एक दो कहानियों पर भाषायी अभिजात्यता का आरोप लग सकता है लेकिन यह कहानी की मांग रही है | तगण ऐसी ही एक कहानी है जिसमें शास्त्रीयता और पांडित्य प्रदर्शन दिख जाता है लेकिन सम्यक पठन के बाद यह स्पष्ट हो जाएगा कि अंधविश्वास पर तर्क की विजय स्थापना के लिए यह आवश्यक है | कुछ कहानियों में कथारस का पान पाठक कर सकेंगे ; अथ श्री सुखई कथा एक ऐसी क...