जुलूस की भीड़ : समय सापेक्षता, समयबाध्य मूल्य और बदले हुए यथार्थ का संकलन
-प्रो.कृपाशंकर चौबे
भवतोष पाण्डेय पेशे से इंजीनियर हैं किंतु लेखक के रूप में भी उनकी अलग पहचान है। उनकी प्रतिनिधि कहानियों का संग्रह ‘जुलूस की भीड़’ इसलिए महत्वपूर्ण है कि इसके पात्र हमारे बीच के आम जन हैं, खास जन नहीं। हम नित्य जिस परिवेश में जी रहे हैं, उस परिचित परिवेश को ही भवतोष अपनी कहानी में उठाते हैं। किंतु वह परिवेश जटिल से जटितर होता जा रहा है। इस संग्रह के आधार पर एक छोटे से आईने में हम यह देख सकते हैं कि हिंदी कहानी आज कहां खड़ी है। ‘जूलूस की भीड़’ संग्रह की ‘वो राम अब नाहीं’, ‘अविश्वास’, ‘आजमाइश’, ‘भूख और भय’, ‘एक माल के सहयात्री’, ‘निर्णय’, ‘निर्दल’, ‘जुलूस की भीड़’, ‘स्कैफोल्ड’, ‘द्वंद्व’, ‘अथश्री सुखई कथा’, ‘अनैतिक नैतिकता’ कहानियां यह बताती हैं कि हिंदी कहानी में आज भोगा हुआ यथार्थ की जगह बदला हुआ यथार्थ है। हिंदी कहानी आज उस बदले हुए यथार्थ के सामने ही खड़ी है। उदारीकरण के सांघातिक नतीजों से लेकर जाति के आधार पर विभाजन और आधुनिक जीवन की जटिलता भवतोष पांडेय की कहानियों के दृश्य में है। भवतोष की कहानियों में विषय वैविध्य ही नहीं है, शिल्प भी वैविध्यपूर्ण है।
संकलन की पहली कहानी है ‘मुक्ता’। मुक्ता अपने प्रेमी अभिनव द्वारा ठगे जाने के बाद जब टायलेट क्लीनर की पूरी बोतल पीकर जब मौत से जूझ रही होती है तब भी उसके पिता नगेश प्रसाद अस्पताल ले जाकर उसे बचाने का साहस नहीं करते क्योंकि तब सबको पता चल जाता कि मुक्ता के पेट में किसी का (उसके प्रेमी अभिनव का) बच्चा है। सामाजिक लोकलाज के भय ने पिता को जड़ बनाया और मुक्ता की इहलीला समाप्त हो जाती है। यह एक तरह से उमराव जान की कहानी की याद दिलाती है ; उमराव को उसके भाई ने अपनाने से इंकार किया था क्योंकि वह नाचने गाने वाली बन गई थी और भाई इज्जतदार। यह कहानी मुक्ता के बहाने स्त्री अस्मिता के हाहाकार को अभिव्यक्त करती है। इसी तरह ‘सारांश’ कहानी प्रेम में विफल होने पर सारांश द्वारा कुटिल आचरण करने और नींद की गोलियां खाकर जीवन लीला समाप्त करने की कथा है। लेकिन भवतोष केवल स्त्री या पुरुष की चीख ही नहीं सुनते, वे स्त्री और पुरुष के समभाव को भी देखते हैं। ‘वर्चस्व’ कहानी पितृ सत्ता से वर्चस्व के प्रतिरोध का ही आख्यान है जहां रवि शिंदे और सुकृति शिंदे पति-पत्नी से अधिक मित्र हैं। दोनों के समान अधिकार हैं। किसी का किसी पर वर्चस्व नहीं। समता मूलक मित्रता के कारण ही खेल में हार-जीत के बावजूद उनमें समभाव कायम रहा। यह कहानी स्त्री विमर्श के अध्येताओं के लिए कई कारणों से उपयोगी है। जीवन के गंभीर प्रसंगों से लेकर हमारे आस-पास जो कुछ घटित हो रहा है, उसे भी भवतोष कहानी का रूप दे देते हैं। ‘अशिष्टता’ कहानी रोजाना की घटनाओं पर आधारित है। उनके केंद्र में एसी कोच में यात्री द्वारा चादर व तौलिया चोरी करने की घटना है। उसमें यात्री खलनायक और जयंतो जैसा कोच अटेंडेंट संग्रामी पात्र बन जाता है। भवतोष के भीतर का संस्कृति का भाष्यकार ‘तगण’ कहानी में मुखर हो उठता है जहां वे आधीश के नाम के शुभ-अशुभ पक्षों की व्याख्या करते हुए तार्किकता को स्थापित करते हैं। उसका संदेश स्पष्ट है कि जीवन धर्म-कर्म से अधिक तार्किकता पर चले। तार्किकता के लिए वे बलवान चरित्रों का निर्माण करते हैं। भवतोष की कहानियों की एक बड़ी विशेषता है समय सापेक्षता। उनकी कहानी कहने की शैली, चित्रण की शैली और वर्णन की शैली हमारा ध्यान अलग से खींचती है। उनकी कहानी में आज के समय के लिए उपयोगी मूल्य भी हैं।
-कृपाशंकर चौबे
प्रोफेसर, संकाय अध्यक्ष एवं छात्र कल्याण अधिष्ठाता, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा ,महाराष्ट्र |

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