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                      'कहानी' की कहानी

                     

    ' कहानी क्या है ' कि जगह अगर 'कहानी क्या नहीं है'  पर  विचार किया जाए तो शायद कहानी के विस्तार को समझना ज़्यादा आसान होगा ! 'षष्ठी शेषे' अर्थात् 'जो बचा वह छठी विभक्ति' वाला सूत्र क्या कहानी पर लग सकता है ? किसी घटना की तथ्यपरक प्रस्तुति कहानी नहीं है | इतिहास लेखन भी कहानी नहीं | धर्मशास्त्र और उसमें उपस्थित नैतिक उपदेश भी कहानी की श्रेणी में नहीं है | समाचार पत्र के लेखों को आजकल 'स्टोरी' कहा जाने लगा लेकिन साहित्यिक अर्थ में वो भी कहानी नहीं है | जो कहानी नहीं है उसमें भी कहानी की संभावना बनी रहती है बस एक समर्थ कहानीकार की ज़रूरत है जो इस संभावना को यथार्थ में बदल सके |

           मन में चल रही उधेड़बुन को शब्दों में गूंथना ही रचना कर्म है | मन में जो चल रहा है उसको ज्यों का त्यों शब्दों के ताने बाने में बुन पाना संभव नहीं है |इसीलिए मन के विचार को शब्दों में जो जितने अच्छे से  व्यक्त कर पाता है वह उतना ही अच्छा रचनाकार है | एक रचनाकार का लक्ष्य दोनों के बीच के आकाश को न्यूनतम करना है |

    कहानियाँ तब से प्रचलन में हैं जब शायद लिपि से मानव समाज परिचित न रहा होगा | उस समय लेखक की जगह वाचक का महत्व था | जो जितने अच्छे से कथा सुना दे , लोगों में दिलचस्पी जगा दे ; वह उतना ही लोकप्रिय कथावाचक रहा होगा | कथा वाचन की सीमा थी कि उसकी पहुँच अपेक्षाकृत कम थी | लिपि विकास के बाद कथा-वाचन को कहानी लेखन से प्रतिस्पर्धा मिली |ध्यान रखना होगा कि कथा और कहानी ध्रुवीय विपरीत नहीं हैं | अंतर वाचन और लेखन का है | जो कही जाए वह कथा और जो लिखी जाए वह कहानी | लेकिन इस परिभाषा में अव्याप्ति दोष भी है | कथा को लेखनीबद्ध भी किया जाता है और लिखी हुई कहानी का वाचन भी होता है |

      कहानी लेखन सायास होता है या अनायास  ? यह एक बहस का विषय है | कहानी लेखन में अगर भाव पक्ष प्रधान हो और बुद्धि पक्ष की आवश्यकता न पड़े तो लेखन अनायास कहा जा सकता है | लेकिन अगर मस्तिष्क में घटनाओं ,चरित्रों और उनके अन्तर्सम्बन्धों का उत्पादन करना पड़े तो कहानी लेखन सायास होगा |  कविता भले ही अनायास हो जाये क्योंकि अपने मूल में यह एक भाव प्रधान रचना है लेकिन कहानी लेखन में थोड़े से प्रयास की आवश्यकता तो पड़ती ही है | इसमें भाव पक्ष से अधिक बुद्धि पक्ष की आवश्यकता पड़ती है | 'गद्यम् कवीनां निकष: वदन्ति ' वाला सूत्र गद्य होने के नाते कहानी पर लागू होता है |

      कहानी का उद्देश्य क्या है ? मनोरंजन करना , उपदेश देना , नैतिकता का निदर्शन करना , क्रांति के लिए प्रेरित करना या भाषायी सौन्दर्य का प्रदर्शन करना , विद्वता प्रदर्शन या फिर पाठकों को संवेदनशील बनाना ? लेखक भले ही कहानी लेखन करके अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ले लेकिन कहानी तभी अपनी सम्यकता को तभी प्राप्त होती है जब वह पाठक द्वारा पढ़ी जाती है | प्रत्येक पाठक एक स्वतंत्र इकाई है और उसकी बौद्धिकता का स्तर अलग अलग है ; इसलिए एक ही कहानी अलग अलग पाठकों के अलग अलग उद्देश्य साध सकती है | 

      कहानी का आकार कितना होना चाहिए ? इस प्रश्न को मैं अनुचित मानता हूँ क्योंकि यह आकार के आधार पर विधा को निर्धारण करने का प्रयास है | अगर अभीष्ट  उद्देश्य कुछ पंक्तियों में पूरा हो जाता है तो कहानी पूरी हो जाती है लेकिन अगर यह सैकड़ों पन्नों में भी नहीं सिमट रहा तो कहानी अधूरी ही कही जायेगी | अगर आकार मायने नहीं रखता है तो फिर उपन्यास और कहानी में अंतर ही क्या बचा ? उपन्यास में घटनाओं ,चरित्रों और परिस्थितियों का अपेक्षाकृत जटिल संबंध होता है जो कहानी में नहीं होता है | उपन्यास कई मसलों को एक साथ साध सकता है जो कहानी के लिए संभव नहीं है |

    अब बात कहानीकार की | एक व्यक्ति कहानीकार या यूँ कहें रचनाकार कैसे बनता है ? सृजन कर्म मानव की अभिलाक्षणिक प्रवृत्ति रही है अन्यथा मानव सभ्यता इतनी विकसित नहीं हुई रहती ! आदिम सभ्यता से आधुनिक सभ्यता तक की यात्रा मानव जाति की सृजनात्मकता का जीवंत उदाहरण है |आदिम युग में  संभवतः जब किसी खानाबदोश ने अपनी किसी जानवर या प्राकृतिक शक्ति से हुई भिड़ंत को अपने साथियों को बताया होगा तो अवश्य ही अपनी बहादुरी के अलंकरण में कुछ कल्पना का आलम्ब लिया हुआ होगा ! वह पहला कथावाचक रहा होगा | फिर आगे थोड़ी बहादुरी व थोड़ा अलंकरण बढ़ा होगा और कथा वाचकों की संख्या बढ़ी होगी | लिपि के विकास के बाद यह कहना मुश्किल है कि कितने दिन बाद कहानी विधा की शुरुआत हुई होगी | ध्यान रहे बात यहाँ किसी एक भाषा विशेष की नहीं है बल्कि सभी भाषाओं की हो रही है |

      नई सहस्राब्दि में  संप्रेषण की विधाएं और स्वरूप में काफ़ी बदलाव आया है | कंप्यूटर और विशेष तौर पर मोबाइल के प्रयोग ने पठन के साथ साथ लेखन को भी काफी बदला है | अब लेखक को कहानीकार बनने के लिए  एक प्रकाशक के प्रमाणपत्र की आवश्यकता नहीं रह गयी है | अनेकों ऑनलाइन प्लेटफॉर्म उपलब्ध हैं जहाँ पर कोई भी नया रचनाकार अपनी रचनाएँ प्रकाशित कर सकता है और अपनी रचना को पाठकों के लिए प्रस्तुत कर सकता है | इस प्रक्रिया में स्तरीय लेखन के परिमाण में निःसंदेह कमी आयी है |

        कहानी के पढ़े जाने के स्वरूप में भी काफी बदलाव आया है | अब लेखक को पाठकों की तुरंत प्रतिक्रिया मिल जाती है | जिससे लेखक को अपनी रचना के स्व-मूल्यांकन में मदद मिलती है |

       'ऑडियो कहानी' की विधा अभी नवजात अवस्था में है | इसमें लेखक स्वयं या उसकी तरफ से अधिकृत  कोई और रचना को इलेक्ट्रॉनिक रूप में रिकॉर्ड करके श्रोताओं के सम्मुख प्रस्तुत करता है | यह मोटा-मोटा कथा वाचन विधा का पुनरागमन ही है |

        कहानी पढ़ने और लिखने का स्वरूप भले ही बदला हो लेकिन इस विधा में उपस्थित कथा-रस ज़्यों का त्यों बना हुआ है जिसका पाठक और श्रोता स्वधर्म के अनुसार पान कर रहे हैं |

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