हिन्दी भाषा और हिन्दी दिवस
अपने ही घर में दोयम दर्ज़े के नागरिक के तौर पर रहने के लिए अभिशप्त हिन्दी की संवैधानिक स्थिति ऐसी नहीं है | भारत के संविधान निर्माताओं ने इसे राजभाषा का पद दिया है ( अनुच्छेद 343 (1) )| इसका अर्थ है है कि केंद्र अपने सारे कार्यकाज और राज्यों से शासकीय संचार हिन्दी भाषा में ही करेगा | साथ में एक शर्त थी कि अंग्रेजी का प्रयोग आगे के 15 वर्षों तक बना रहेगा | अंग्रेजी के प्रयोग को कम करने और उसी के समान्तर हिन्दी का प्रसार हो ; इसके लिए भारत के संविधान भाग 17 के अध्याय 4 के अनुच्छेद 351 में हिंदी भाषा के विकास के लिए दिया गया विशेष निर्देश इस प्रकार है :- "संघ का यह कर्तव्य होगा कि वह हिंदी भाषा का प्रसार बढ़ाए, उसका विकास करे ताकि वह भारत की सामासिक संस्कृति के सभी तत्वों के का माध्यम बन सकें तथा उसकी प्रकृति में हस्तक्षेप किए बिना हिंदुस्तानी के और आठवी अनुसूची में विनिर्दिष्ट भारत की अन्य भारतीय भाषाओं के प्रयुक्त रूप, शैली और पदो को आत्मसात् करते हुए तथा जहाँ आवश्यक या वाँछनीय हो वहाँ उसके शब्द-भंडार के लिए मुख्यत: संस्कृत से तथा गौणत: अन्य भाषाओं से शब्द ग्रहण करते हुए उसकी करे। "
अंग्रेजी हुकूमत के ख़ात्मे के बाद भी नौकरशाही और शासन अभिजात्य और अधिपत्यवाद के संस्कारों से मुक्त नहीं हुआ | अंग्रेजी के प्रयोग को कम करने की ज़िम्मेदारी जिन नौकरशाहों को दी गयी , वो कर्तव्यच्युत रहे | इन पंद्रह सालों में हिन्दी के प्रयोग में कुछ ख़ास वृद्धि नहीं हुई | अंग्रेज़ी एक भाषा की जगह श्रेष्ठता की पहचान बनायी गयी | सदियों की गुलामी ने हमारे मेधा शक्ति को ऐसा आच्छादित किया कि हमने अंग्रेजी को मालिक और अपनी हिन्दी को नौकर समझ लिया | इसका परिणाम ये हुआ कि जब अंग्रेजी को पूरी तरीके से अपदस्थ करने का समय आया तो उपनिवेशवादी अंग्रेजी तंत्र ने संकीर्ण क्षेत्रीय शक्तियों से हाथ मिलाकर हिन्दी के खिलाफ एक ऐसा माहौल बनाया कि संसद को राजभाषा अधिनियम 1963 पास करना पड़ा जिसमें प्रावधान था कि अंग्रेजी का प्रयोग तब तक बना रहेगा जब तक संसद कोई और कानून नहीं बना देती !अब हिन्दी विरोधियों को संसद के इस कानून का सहारा मिल गया जिसे प्रयोग करके हिन्दी के विरुद्ध और माहौल बनाया जाने लगा | राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन में जिन राज्यों यथा तमिलनाडु , आंध्र प्रदेश , बंगाल , महाराष्ट्र आदि से हिन्दी को सबसे ज़्यादा समर्थन दिया और इसे देश को जोड़ने वाली भाषा कहा , उन्हीं राज्यों में हिन्दी के बहिष्कार के लिए आंदोलन होने लगा | इसका कारण राजनीतिक था |
हिन्दी भाषा की कार्यालयीय स्थिति
राजभाषा विभाग, गृह मंत्रालय ने देश को तीन समूहों में वर्गीकृत किया है : क ,ख और ग क्षेत्र | ये राज्य समूह हिन्दी के प्रयोग की मात्रा के आधार तय किये गए हैं | क राज्यों के सरकारी कार्यालयों और मंत्रालयों में अधिकतर कार्य हिन्दी में किये जाते हैं | ख और ग क्षेत्रों में प्रयोग क्रमशः कम से कमतर है | सबसे बड़ी चुनौती ग समूह के क्षेत्रों में है जहाँ हिन्दी का प्रयोग न्यूनतम है | इस श्रेणी में तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश (तेलंगाना समेत) | इन राज्यों के नेताओं का आरोप है कि हिन्दी हमारी मातृ भाषाओं को ख़त्म कर सकती है | यह अपने मूल में साम्राज्यवादी है |
हिन्दी भाषा पर साम्राज्यवादी आरोप कहाँ तक सही ?
अहिन्दी क्षेत्र अंग्रेजी को अपनी सम्पर्क भाषा बनाने में तो संकोच नहीं करते हैं लेकिन हिन्दी को उपनिवेशवादी बोलने में तनिक भी नहीं हिचकते हैं | यह रवैया बताता है कि कैसे अंग्रेजी भाषा जो औपनिवेशिक शक्तियों की संस्कृति की वाहक रही है ,ने अपने वर्चस्व बनाये रखने के लिए अपनी पैठ सत्ता में बना रखी है |
हिन्दी कोई बाहरी भाषा नहीं कि उसे अपने ही देश में उपनिवेश स्थापित करना पड़े | यह तो देश के बहुलांश द्वारा बोले जाने वाली भाषा है | हिन्दी का अन्य बोलियों से बहनों का है , माँ और बेटी का नहीं ; और सभी बहनों की माँ है संस्कृत |
हिन्दी के प्रयोग का यह अर्थ बिल्कुल नहीं कि मातृभाषा का प्रयोग नहीं करना है बल्कि कार्यालयीय सम्पर्क भाषा के रूप में आज जिस अंग्रेजी का प्रयोग हो रहा है उसकी जगह राजभाषा हिन्दी का प्रयोग करना है | साफ है कि हिन्दी अपने मूल में साम्राज्यवादी बिल्कुल भी नहीं है | भाषा सिर्फ़ संचार का माध्यम ही नहीं अपितु वह संस्कृति की वाहक भी होती है | विदेशी भाषा अंग्रेजी ने जिस तरीके से आधुनिकरण के नाम पर पश्चिमीकरण कर डाला , उससे भारतीय संस्कृति दूषित होने लगी | संस्कृति के इस आदान प्रदान में फ़ायदा कम दूषण ज़्यादा हुआ | यह एक उचित समय है जब अंग्रेजी को संचार और राजभाषा पद से अपदस्थ करके हिन्दी के संवैधानिक दर्ज़े को कायम किया जाए
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हिन्दी दिवस की उपादेयता
क्या हिन्दी पखवाड़ा आयोजन एक कर्मकांड बनकर रह गया है ?
14 सितम्बर 1949 के दिन संविधान सभा ने हिन्दी को राजभाषा के पद पर स्थापित करने का प्रस्ताव पास किया था | वर्धा प्रचार समिति की अनुसंशा पर 1953 से प्रति वर्ष 14 सितम्बर को हिन्दी दिवस मनाया जाता है | केंद्र सरकार के विभागों ,मंत्रालयों और उनके अधीन विभिन्न सार्वजनिक प्रतिष्ठानों में हिन्दी सप्ताह या हिन्दी पखवाड़ा आवश्यक तौर पर मनाया जाता है | हिन्दी पत्र लेखन, अनुवाद लेखन ,निबंध , वाद विवाद तथा स्लोगन आदि प्रतियोगिताओं के माध्यम से हिन्दी के अधिकाधिक प्रयोग को बढ़ावा देने का प्रयास किया जाता है | कुछ लोगों का आक्षेप है कि सिर्फ़ पंद्रह दिन हिन्दी पखवाड़ा मना लेने से क्या हिन्दी के प्रयोग को बढ़ावा मिल जायेगा ? क्या यह एक पाक्षिक कर्मकांड बनकर नहीं रह गया है ? यह आरोप कुछ सीमा तक सही भी है और गलत भी | हिन्दी प्रयोग के लिए कोई दिन या एक सप्ताह और पखवाड़ा नहीं हो सकता ,यह पूरे वर्ष अहर्निश प्रयोग करने की चीज़ है | इसके लिए पूरे वर्ष हिन्दी में प्रयोग करने वाले कार्मिकों के लिए त्रैमासिक प्रोत्साहन योजना चलायी जाती है | अहिन्दी भाषियों के लिए प्रबोध , प्रवीण और प्राज्ञ के प्रशिक्षण कार्यक्रम वर्ष पर्यन्त चलते रहते हैं | अगर हिन्दी के प्रचार के लिए वर्ष पर्यन्त कार्यक्रम चल रहे हैं तो हिन्दी दिवस की आवश्यकता पड़ ही क्यों रही है ? दरअसल हिन्दी दिवस साल भर में एक 'निरक्षकीय गश्त' लगाता है जो साल भर में हुई हिन्दी की प्रगति का मूल्यांकन करता है |
लेकिन समस्या उन सरकारी प्रतिष्ठानों में आती है जो तकनीकी विषयों से संबंध हैं ; जैसे कि सार्वजनिक उपक्रम | यहां बहुलांश में काम अंग्रेजी में ही होता है | तकनीकी रिपोर्ट , ईमेल पत्राचार , टिप्पणी पत्र , ऑडिट रिपोर्ट , लॉग बुक आदि में लेखन अंग्रेजी में ही होता है | हिन्दी के प्रयोग के नाम पर सिर्फ़ खाना पूर्ति होती है | कहा जाता है कि किसी भी संस्थान में नायकत्व हमेशा शीर्ष से प्रवाहित होती है जो अधीनस्थों को प्रेरित करती है | लेकिन हिन्दी प्रयोग के मामले में ठीक इसके विपरीत होता है | सरकारी विभागों खासकर तकनीकी प्रतिष्ठानों का शीर्ष प्रबन्धन पूरे वर्ष तो अंग्रेजी में व्यवहार करता है लेकिन हिन्दी पखवाड़े के दौरान हिन्दी के अधिकाधिक प्रयोग के लिए प्रेरित करता है | इस अर्थ में हिन्दी दिवस सह हिन्दी पखवाड़ा कर्मकांड बनकर रह जाता है |
हिन्दी दिवस से इतर प्रयास भी ज़रूरी
अगर कोई व्यक्ति बचपन से किसी भाषा के प्रति बनाए गए विद्वेष पूर्ण माहौल में रहा हो तो उसे यकायक नौकरी के दौरान कार्यालय में उसे एक नई भाषा नहीं सिखायी जा सकती है | भले ही वह कार्यालयीय बाध्यताओं के कारण सीख ले , उसको व्यवहार में कभी भी नहीं लायेगा | इस समस्या का निवारण है त्रिभाषा सूत्र (1968 में प्रस्तावित ) में समाहित है | इस सूत्र के अनुसार उत्तर भारतीय राज्य अपने छठवीं से आठवीं तक के पाठ्यक्रम में हिन्दी , एक अंतर्राष्ट्रीय भाषा और एक आठवीं अनुसूची की कोई एक आधुनिक भाषा ( विशेषकर दक्षिण भारतीय भाषा ) समाहित करेंगे | जबकि दक्षिण भारतीय राज्य एक मातृ भाषा , एक अंतर्राष्ट्रीय भाषा और हिन्दी अपने छठवीं से आठवीं तक के पाठ्यक्रम में शामिल करेंगे | 1968 से प्रस्तावित यह त्रिभाषा सूत्र आज तक अपने मूल रूप में लागू नहीं हो पाया | इसकी असफलता के लिए न सिर्फ़ दक्षिण भारतीय राज्यों के संकीर्ण राजनीतिक स्वार्थ ज़िम्मेदार हैं बल्कि उत्तर भारतीय राज्य भी कम उत्तरदायी नहीं है | त्रिभाषा सूत्र की व्यवस्था में तीसरी आधुनिक भाषा में दक्षिण भारतीय की भाषा की जगह संस्कृत से काम चला लिया गया क्योंकि राज्यों ने तेलगु ,तमिल ,मलयालम या कन्नड़ के अध्यापकों को नियुक्त करने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखायी | फिर कैसे दक्षिण भारतीय राज्यों से हम त्रिभाषा सूत्र में हिन्दी को अनिवार्य करने के लिए कह सकते हैं ? हाल ही में (2019 ) जब नई शिक्षा नीति के मसौदे में त्रिभाषा सूत्र को लागू करने की बात आयी तो तमिलनाडु के कुछ विपक्षी नेताओं ने वितंडा मचाना शुरू किया कि उन पर हिन्दी थोपने की कोशिश की जा रही है | बढ़ते विरोध को देखते हुए सरकार को स्पष्टीकरण देना पड़ा और एक तरह से त्रिभाषा सूत्र फिर से राजनीति का शिकार हो गया |
चूँकि जब भाषा की समस्या राजनीतिक हो चुकी है तब इसका समाधान भी राजनीतिक तरीके से ढूढ़ना होगा | केंद्र को उन राज्यों में जहाँ हिन्दी का विरोध है ,के पक्ष और विपक्ष के सभी नेताओं से मिलकर इस मुद्दे का समाधान खोजना होगा | दक्षिण भारतीय नेताओं को इस बात का विश्वास दिलाये जाने की आवश्यकता है कि हिन्दी की प्रतिस्पर्धा अंग्रेजी से है , अपनी बहनों (तमिल ,तेलगु ,कन्नड़,मराठी आदि ) से नहीं है | अगर हिन्दी को अपनी बहनों का साथ मिल जाए तो फिर इस एकता से अंग्रेजी को अपदस्थ करने में आसानी होगी | इस साथ को पाने के लिए पहले दक्षिण भारतीय राज्यों का विश्वास जीतना होगा | यह तभी संभव है जब उत्तर भारतीय राज्य त्रिभाषा सूत्र को उसकी मूल आत्मा के साथ लागू करें और फिर दक्षिण भारतीय राज्यों से हिन्दी पढ़ाए जाने हेतु त्रिभाषा सूत्र को लागू करने लिए केंद्र द्वारा बोला जाए | ' निज भाषा उन्नति अहै , सब उन्नति को मूल ..'
हिन्दी भाषा में मौलिक अनुसंधान और कार्य के बिना इसके प्रयोग को हर क्षेत्र में बढ़ाना मुश्किल होगा अन्यथा यह सिर्फ एक अनुवाद की भाषा रह जायेगी |
( वर्तमान में गेल पाता में वरिष्ठ प्रबंधक पद पर तैनात युवा लेखक भवतोष पाण्डेय का हाल ही में कथा संकलन : जुलूस की भीड़ प्रकाशित हुआ है |)
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